प्रथम पीढ़ी के प्रमोचक
परिज्ञापी रॉकेट
एसएलवी3
एएसएलवी
प्रचालनात्मक प्रमोचक
 पीएसएलवी
 जीएसएलवी
अगली पीढ़ी के प्रमोचक
एलवीएम3

भारतीय प्रमोचन यान

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उपग्रहों को अंतरिक्ष में उनके लिए निर्धारित कक्षाओं में ले जाने के लिए प्रमोचकों का उपयोग किया जाता है। तिरुवनंतपुरम के वेली पहाड़ियों में वर्ष 1965 में जब अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र (एसएसटीसी) की स्थापना की गई तब से उपग्रह प्रमोचन क्षमता प्राप्त करने के लिए प्रणालियों तथा घटकों के विकास पर अनुसंधान शुरू हुआ। प्रथम दो दशकों में, ठोस तथा द्रव नोदकों, नोदन पदार्थों, रॉकेट हार्डवेयर विकास एवं संरचना, और मार्गनिर्देशन, नियंत्रण तथा इलेक्ट्रॉनिकी विकास के क्षेत्रों की तरह अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी व संबंधित विविध क्षेत्रों में अत्यधिक प्रगति नज़र आई। सीमित प्रदायभार क्षमता के साथ ही सही, वर्ष 1980 में एक निकट भू-कक्षा तक लैंडमार्क कैमरा प्रणाली वाहित उपग्रह प्रमोचन यान (एसएलवी3) की सफल उड़ान के साथ, प्रमोचन क्षमता में भारत आत्मनिर्भरता प्राप्त कर सकीं। उस समय संवर्धित उपग्रह प्रमोचन यान (एएसएलवी) तथा ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान (पीएसएलवी) अभिकल्पना चरण पर थे। एएसएलवी ने अपनी तीसरी उड़ान में इसरो की तकनीकी गरिमा साबित की।

वर्ष 1982 से 1993 की अवधि में ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान (पीएसएलवी) का विकास हुआ। यह एएसएलवी के विकास की अवधि का अतिव्यापन करता है। वर्ष 1994 में कोशिश की गई पीएसएलवी की प्रथम विकासात्मक उड़ान सफल नहीं हो पाई। अक्तूबर 1994 में हुई पीएसएलवी की द्वितीय विकासात्मक उड़ान सफल निकली। तब से लेकर अब तक पीएसएलवी ने लगातार छत्तीस सफल उड़ानें पूरी की हैं। वर्ष 1997 में पीएसएलवी को प्रचालनात्मक घोषित किया गया। इसके बदौलत इसरो, सुदूर संवेदन उपग्रहों के लिए प्रमोचनों का क्रय समाप्त कर सका। इस यात्रा में, पीएसएलवी ने स्वयं को विविध अभियानों के लिए बहुमुखी तथा विश्वसनीय यान साबित किया।

 

भारी प्रमोचक जीएसएलवी मार्क III (उर्फ एलवीएम3) का लक्ष्य है जीटीओ क्षमता को 4000 कि.ग्रा. तक बढ़ाना और यह अब विकासाधीन है।