अंतरिक्ष संग्रहालय

तटरेखा से कुछ मीटर दूरी पर, तुंबा भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रमोचन स्टेशन (टर्ल्स) की उत्तरी सीमा के निकट स्थित, उच्च तकनीकी शिल्प-तथ्यों तथा दृश्यों से युक्त, सेंट मेरी मग्दलेन गिरिजाघर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जन्म की कहानी सुनाता है।

वर्ष 1962 में इसी गिरिजाघर में प्रथम रॉकेट प्रणालियों का समुच्चयन किया गया था। बिशप हाउस, जो गिरिजाघर का हिस्सा है, उस समय निदेशक, टर्ल्स के कार्यालय के रूप में कार्य करता था। वैज्ञानिक गतिविधियों को संवेग प्राप्त होने के साथ-साथ नई परियोजनाएं सामने आईं, जिससे नए भवनों का निर्माण आवश्यक हो गया। उनमें पहले नियंत्रण केंद्र तथा बाद में वेली गिरियों का आर एवं डी कॉम्प्लेक्स थे, जिन्होंने गिरिजाघर के भवन को पृष्ठभूमि में छोड दिया।

लेकिन, वह पुराना गिरिजाघर विस्मरण में जाने के लिए तैयार नहीं था। वह नए ओज के साथ वापस जीवित हो गया। उसे एक फोटोग्राफी सुविधा के रूप में परिवर्तित किया गया। इस बार भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के कार्यालयीन इतिहासकार के रूप में। वर्ष 1985 में इस गिरिजाघर को अंतरिक्ष संग्रहालय के रूप में परिवर्तित किया गया। इस संग्रहालय के प्रांगण में पीएसएलवी तथा पीएसएलवी ऊष्मा कवच के पूर्ण-मान प्रतिरूप हैं। जीएसएलवी, जीएसएलवी मार्क-।।। व एटीवी के घटाए गए मान के (आकार का 1/5) प्रतिरूप भी इस संग्रहालय में हैं। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की नवजात दशा से शुरू होनेवाली कहानी सुनाता है। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की कथा छः अनुभागों में सामने आती है, जिसमें इतिहास, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, अनुप्रयोग, वैश्व व भविष्य शामिल हैं। सराउंड ध्वनि प्रणाली से युक्त एक चलचित्र थिएटर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम पर विशेष रूप से तैयार चलचित्रों का प्रदर्शन करता है।  

यह संग्रहालय एक वर्ष के दौरान लाखों की संख्या में छात्रों व आम जनता सहित भीड़ को आकर्षित करता है। रविवारों तथा घोषित छुट्टियों को छोड़कर सभी दिन 09.30 से 16.00 बजे तक यह संग्रहालय आम जनता के लिए खुला है।

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परिज्ञापी रॉकेट प्रमोचन

सामान्यत: या, वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिए हर महीने तीसरे बुधवार को 11.45 बजे (किसी तकनीकी कारण के लिए परिवर्तनाधीन) टर्ल्स से परिज्ञापी रॉकेटों का प्रमोचन किया जाता है। अंतरिक्ष संबंधी गतिविधियों से जनसाधारण को उत्साहित करने के उद्देश्य से दर्शकों को प्रमोचन देखने की अनुमति दी जाती है।

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